भारतीय लोकतंत्र में स्थायित्व और अस्थिरता: क्षेत्रीय दलों की भूमिका का मूल्यांकन

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पुष्पेन्द्र सिंह, डाॅ॰ रीता

Abstract

भारतीय लोकतंत्र विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रणाली है, जिसकी विशेषता इसकी बहुदलीय संरचना और विविधतापूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। इस लोकतंत्र में क्षेत्रीय दलों का उदय न केवल राजनीतिक बहुलता का परिचायक है, बल्कि यह क्षेत्रीय आकांक्षाओं, भाषाई अस्मिता और सामाजिक पहचान को भी राजनीतिक मुख्यधारा से जोड़ता है। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में भारतीय राजनीति मुख्यतः राष्ट्रीय दलों, विशेषकर कांग्रेस, के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, किंतु 1967 के बाद क्षेत्रीय दलों ने राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। 1989 के बाद गठबंधन युग की शुरुआत ने क्षेत्रीय दलों की भूमिका को निर्णायक बना दिया।
क्षेत्रीय दलों की भूमिका भारतीय लोकतंत्र में दोहरी रही है। एक ओर उन्होंने लोकतंत्र को गहन और समावेशी बनाया, स्थानीय हितों को राष्ट्रीय मंच पर लाने का कार्य किया तथा विकेंद्रीकरण और सामाजिक न्याय को बढ़ावा दिया। दूसरी ओर, इन दलों के उदय ने राजनीतिक अस्थिरता को भी जन्म दिया। बार-बार सरकारों के गिरने, अवसरवादी गठबंधनों, राष्ट्रीय हितों पर क्षेत्रीय स्वार्थ की प्रधानता और नीतिगत असंगतियों ने लोकतांत्रिक स्थायित्व को चुनौती दी है। विशेष रूप से 1990 के दशक में अल्पायु सरकारों और गठबंधन संकटों ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया।
आज की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति अपरिहार्य है। वे एक ओर राष्ट्रीय दलों को जवाबदेह बनाते हैं और लोकतांत्रिक विविधता को सुरक्षित रखते हैं, वहीं दूसरी ओर नीति-निर्माण और प्रशासनिक स्थायित्व में बाधाएँ भी उत्पन्न करते हैं। अतः भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए तथा चुनावी सुधारों के माध्यम से गठबंधन राजनीति को स्थिर और उत्तरदायी बनाया जाए।

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पुष्पेन्द्र सिंह, डाॅ॰ रीता. (2025). भारतीय लोकतंत्र में स्थायित्व और अस्थिरता: क्षेत्रीय दलों की भूमिका का मूल्यांकन. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(3), 944–951. Retrieved from https://ijarmt.com/index.php/j/article/view/572
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