परशुराम शुक्ल की बाल कहानियों में अभिव्यक्त समाज और संस्कृति

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राजेश कुमारी
डाॅ॰ राजेन्द्र सिंह

Abstract

साहित्य समाज का दर्पण है, समाज में जो घटित होता है, उसका प्रतिबिम्ब साहित्य में दिखाई देता है। जीवन की वास्तविकता को साहित्यकार सदैव लिखता रहा है। हमारी वर्तमान पीढ़ी को भविष्य में आने वाली पीढ़ी से जोड़ने की कड़ी बच्चे होते हैं। बाल-साहित्य, हिंदी साहित्य की एक सशक्त विद्या है। बाल-साहित्य बच्चों को केंद्र में रखकर लिखा जाने वाला साहित्य है। यह साहित्य प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक निरन्तर लिखा जा रहा है। स्वतन्त्रता से पूर्व बाल-साहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य समझकर बड़े-बड़े साहित्यकार इसे लिखने से कतराते थे, लेकिन वर्तमान में बाल-साहित्य को बड़े से बड़ा लेखक भी लिखकर अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है। वर्तमान में अनेक साहित्यकार बाल-साहित्य लिख रहे हैं। कुसुम डोमाल, प्रमाश मनु, हरिकृष्ण देवसरे, सुरेन्द्र विक्रम, मनोज कुमार आदि इन बाल-साहित्यकारों में एक प्रमुख नाम डॉ॰ परशुराम शुक्ल का भी है।

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How to Cite
राजेश कुमारी, & डाॅ॰ राजेन्द्र सिंह. (2026). परशुराम शुक्ल की बाल कहानियों में अभिव्यक्त समाज और संस्कृति. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 3(2), 143–145. Retrieved from https://ijarmt.com/index.php/j/article/view/872
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Articles

References

परशुराम शुक्ल, इंद्रधनुषी कहानियां, साहित्यगार, जयपुर, 2011

परशुराम शुक्ल, कर्मयोगी, पॉपुलर बुक डिपो, जयपुर, 2010

परशुराम शुक्ल, क्रोध का बीज, श्रेया प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009

परशुराम शुक्ल,सोने का हिरण, पार्वती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009

परशुराम शुक्ल, भारतीय वीरांगनाएं, सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली, 2005

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