हिंदी और पंजाबी दलित आत्मकथाओं में परंपरा, विकास एवं साहित्यिक रूपों का तुलनात्मक अध्ययन
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Abstract
दलित आत्मकथात्मक लेखन भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक तथा सामाजिक-राजनीतिक विधा के रूप में उभरा है, जो जाति-आधारित हाशियाकरण, प्रतिरोध और आत्म-अभिव्यक्ति के अनुभूत अनुभवों को केंद्र में रखता है। यह शोध-पत्र हिंदी और पंजाबी दलित आत्मकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है, जिसमें उनकी परंपरा, ऐतिहासिक विकास तथा साहित्यिक रूपों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। दलित साहित्य सिद्धांत, अधीनस्थ अध्ययन तथा आत्मकथा एवं जीवन-लेखन सिद्धांतों के आधार पर यह अध्ययन इस बात का विश्लेषण करता है कि किस प्रकार व्यक्तिगत जीवन-वृत्त सामूहिक साक्ष्य और प्रतिपक्षी इतिहास के रूप में कार्य करते हैं, जो प्रभुत्वशाली जाति-केंद्रित साहित्यिक और ऐतिहासिक विमर्शों को चुनौती देते हैं। तुलनात्मक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जहाँ हिंदी दलित आत्मकथाएँ यथार्थवादी और संघर्षशील कथन-शैली के माध्यम से संस्थागत भेदभाव और राजनीतिक आत्म-दावा प्रस्तुत करती हैं, वहीं पंजाबी दलित आत्मकथाएँ कृषि-जीवन, सांस्कृतिक स्मृति और सामुदायिक इतिहास में निहित अधिक चिंतनशील और संवादात्मक दृष्टि को अपनाती हैं। यह शोध तर्क प्रस्तुत करता है कि दलित आत्मकथाएँ केवल व्यक्तिगत आत्म-प्रतिनिधित्व तक सीमित न रहकर सांस्कृतिक प्रतिरोध और सामाजिक आलोचना के सशक्त माध्यम बनती हैं, जिससे आत्मकथा भारतीय साहित्य में एक सामूहिक, नैतिक तथा राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में पुनर्परिभाषित होती है।
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