गणराज्य और राजतंत्रः महाजनपदकालीन राजनीतिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन
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प्राचीन भारतीय इतिहास में ईसा-पूर्व छठी शताब्दी का काल राजनीतिक संरचनाओं की विविधता के कारण विशेष महत्त्व रखता है। इस समय उत्तर भारत में एक ओर मगध, कोशल, वत्स और अवन्ति जैसे राजतंत्रीय महाजनपद विकसित हो रहे थे, तो दूसरी ओर वज्जि, मल्ल, शाक्य, कोलिय तथा कुछ अन्य गण-संघ ऐसी व्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते थे जिनमें सत्ता किसी एक वंशानुगत सम्राट के हाथों में केंद्रित न होकर सीमित शासक कुलों की सभा में निहित थी। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य इन दोनों राजनीतिक रूपों का संस्थागत और तुलनात्मक अध्ययन करना है। इसमें गणराज्य को आधुनिक सार्वभौम लोकतंत्र के समान न मानकर कुलीनतंत्रीय या क्षत्रिय-आधारित सामूहिक शासन के रूप में समझा गया है, क्योंकि राजनीतिक अधिकार समाज के सभी वर्गों को समान रूप से प्राप्त नहीं थे। इसके विपरीत राजतंत्र में राजा राज्य का केंद्रीय प्रतीक, सर्वोच्च कार्यपालिका तथा राजकीय अधिकार का प्रमुख स्रोत था, यद्यपि मंत्रियों, पुरोहितों, अधिकारियों और परंपरागत संस्थाओं का प्रभाव भी बना रहता था। अध्ययन में सभा की संरचना, निर्णय-प्रक्रिया, नेतृत्व-चयन, उत्तराधिकार, न्याय, प्रशासन, सैन्य संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक उत्तरदायित्व के आधार पर दोनों व्यवस्थाओं की तुलना की गई है। निष्कर्षतः गणराज्यों में सामूहिक विचार-विमर्श और अभिजात सहभागिता की अपेक्षाकृत अधिक गुंजाइश थी, जबकि राजतंत्रों में निर्णय की गति, प्रशासनिक केंद्रीकरण और आदेश-पालन की क्षमता अधिक विकसित थी। इस प्रकार महाजनपदकालीन भारत में गणराज्य और राजतंत्र परस्पर विरोधी ही नहीं, बल्कि राज्य-निर्माण के दो भिन्न ऐतिहासिक मार्ग थे। तुलनात्मक विश्लेषण यह भी दर्शाता है कि दोनों प्रणालियाँ अलग सामाजिक आधारों और वैधता के स्रोतों से विकसित हुई थीं।
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