डॉ. मिथिलेश शर्मा का संस्कृत साहित्य में धार्मिक अवदान : एक विवेचन

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Dr. Narender Kumar
Renu Yadav

Abstract

संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का मूलाधार रहा है। भारतीय सभ्यता के विकास में संस्कृत भाषा और उसके साहित्य ने जिस प्रकार मानव जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पक्षों को दिशा प्रदान की है, वह विश्व साहित्य में अद्वितीय माना जाता है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ तथा काव्यग्रंथ केवल साहित्यिक रचनाएँ ही नहीं हैं, बल्कि भारतीय धर्म और जीवन-दर्शन के संवाहक भी हैं। संस्कृत साहित्य ने सदैव मानवता, धर्म, नैतिकता, करुणा, सत्य और लोकमंगल जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। इसी कारण संस्कृत साहित्य को भारतीय संस्कृति की आत्मा कहा जाता है।


धर्म भारतीय जीवन का अभिन्न अंग रहा है। यहाँ धर्म का अर्थ केवल संप्रदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, अपितु वह मानव के आचरण, कर्तव्य, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का व्यापक स्वरूप है। भारतीय मनीषियों ने धर्म को लोककल्याण और आत्मोन्नति का साधन माना है। संस्कृत साहित्य में धर्म के इसी व्यापक स्वरूप का निरूपण हुआ है। ऋग्वेद से लेकर आधुनिक संस्कृत साहित्य तक धार्मिक चेतना की अखंड धारा प्रवाहित होती रही है। संस्कृत साहित्यकारों ने अपने साहित्य के माध्यम से धर्म और अध्यात्म को जनमानस तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।


आधुनिक संस्कृत साहित्य में अनेक विद्वानों एवं साहित्यकारों ने धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रयास किया है। इन साहित्यकारों में डॉ. मिथिलेश शर्मा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने संस्कृत साहित्य की परंपरा को आधुनिक युग में नवीन दृष्टिकोण प्रदान करते हुए धार्मिक चेतना, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों तथा आध्यात्मिक विचारधारा को अपनी रचनाओं में सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया है। उनका साहित्य केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें धार्मिक संवेदना, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना भी निहित है।


डॉ. मिथिलेश शर्मा संस्कृत भाषा और साहित्य के ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने अपने लेखन द्वारा भारतीय धार्मिक परंपरा को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। उनकी रचनाओं में धर्म के विविध आयाम—आध्यात्मिकता, भक्ति, नैतिकता, मानवतावाद, संस्कार, लोकमंगल और सांस्कृतिक चेतना—स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। उन्होंने अपने साहित्य में भारतीय संस्कृति के उन आदर्शों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है, जो आधुनिक युग में कहीं न कहीं क्षीण होते दिखाई देते हैं। उनके साहित्य में धार्मिक भावना केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मानवीय मूल्यों और जीवन के आदर्शों से गहराई से जुड़ी हुई है।

Article Details

How to Cite
Dr. Narender Kumar, & Renu Yadav. (2025). डॉ. मिथिलेश शर्मा का संस्कृत साहित्य में धार्मिक अवदान : एक विवेचन. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 2(1), 1179–1190. Retrieved from https://ijarmt.com/index.php/j/article/view/1006
Section
Articles

References

डॉ. मिथिलेश शर्मा, शौर्यगाथा (अमरहुतात्मनः ऊधमसिहस्य) परिचय भाग

डॉ.मिथिलेश शर्मा, पं० दीनदयाल उपाध्याय चरितम्, परिचय भाग

जे.पी. सिंह, समाजशास्त्र की अवधारणा एवं सिद्धान्त, पृ. 43.

विचार तिथि मिशनरी और शिक्षा संस्थाएं, पांजन्य, 24 अक्टूबर, 1955, पृ. 99.

परिमल, बी., समाजशास्त्र, सामाजिक अन्तः क्रियाओं का अध्ययन, जवाहर पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, पृ. 468

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