विकसित भारत में महिला सुरक्षा: एक चुनौती

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अंशु शर्मा, प्रो॰ (डॉ॰) मीनाक्षी शर्मा

Abstract

‘विकसित भारत’ की परिकल्पना केवल आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विस्तार और तकनीकी उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना से भी जुड़ी हुई है। इस संदर्भ में महिला सुरक्षा विकसित भारत की अवधारणा का एक अनिवार्य और केंद्रीय घटक है। जब तक महिलाओं को सुरक्षित, सम्मानजनक और भयमुक्त वातावरण प्राप्त नहीं होगा, तब तक किसी भी राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में विकसित नहीं माना जा सकता। भारतीय समाज में संवैधानिक प्रावधानों, सख्त कानूनों और सरकारी योजनाओं के बावजूद महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर भेदभाव तथा साइबर अपराध जैसी समस्याएँ निरंतर बनी हुई हैं।  यह शोध-पत्र विकसित भारत की यात्रा में महिला सुरक्षा को एक गंभीर चुनौती के रूप में विश्लेषित करता है। इसमें महिला सुरक्षा की अवधारणा, वर्तमान सामाजिक स्थिति, कानूनी एवं संस्थागत ढाँचे की प्रभावशीलता तथा उनके क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन किया गया है। साथ ही, पितृसत्तात्मक मानसिकता, लैंगिक असमानता, जागरूकता की कमी और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों को भी रेखांकित किया गया है। शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि तकनीकी विकास, डिजिटल प्लेटफॉर्म और शहरीकरण ने जहाँ एक ओर नए अवसर प्रदान किए हैं, वहीं दूसरी ओर महिला सुरक्षा से संबंधित नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं।

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How to Cite
अंशु शर्मा, प्रो॰ (डॉ॰) मीनाक्षी शर्मा. (2024). विकसित भारत में महिला सुरक्षा: एक चुनौती. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 1(2), 579–590. Retrieved from https://ijarmt.com/index.php/j/article/view/643
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विकसित भारत की परिकल्पना तभी सार्थक और पूर्ण मानी जा सकती है जब उसमें महिला सुरक्षा को केंद्रीय स्थान प्राप्त हो। आर्थिक प्रगति, तकनीकी उन्नति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लक्ष्य उस समय तक अधूरे रहते हैं, जब तक समाज की आधी आबादी भय, असुरक्षा और भेदभाव के वातावरण में जीवन यापन करने को विवश हो। इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि महिला सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मानसिकता, आर्थिक स्थिति और शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता से गहराई से जुड़ा हुआ है। संविधान और कानूनों ने महिलाओं को अधिकार और संरक्षण प्रदान किए हैं, किंतु उनके प्रभावी क्रियान्वयन के अभाव में अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं।

यह भी स्पष्ट है कि महिला सुरक्षा और विकास के मध्य घनिष्ठ एवं पारस्परिक संबंध विद्यमान है। सुरक्षित वातावरण महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करता है, जिससे मानव संसाधन का समुचित विकास होता है। इसके विपरीत, असुरक्षा महिलाओं की क्षमताओं को सीमित कर देती है और राष्ट्रीय विकास की गति को बाधित करती है। सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ, पितृसत्तात्मक सोच, कमजोर न्यायिक प्रक्रिया और नई तकनीकों के साथ उभरते अपराध इस समस्या को और जटिल बना देते हैं।

अतः महिला सुरक्षा के लिए एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है, जिसमें कानून, शिक्षा, तकनीक, प्रशासन और सामाजिक चेतना का समन्वय हो। केवल दंडात्मक उपायों से नहीं, बल्कि मानसिकता परिवर्तन, लैंगिक संवेदनशीलता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और डिजिटल साक्षरता के माध्यम से ही स्थायी समाधान संभव है। अंततः यह कहा जा सकता है कि सुरक्षित महिला ही सशक्त परिवार, समृद्ध समाज और विकसित भारत की आधारशिला है। जब महिलाएँ भयमुक्त होकर अपने अधिकारों और क्षमताओं का प्रयोग कर सकेंगी, तभी भारत वास्तव में एक समावेशी, न्यायपूर्ण और विकसित राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेगा।