प्रारम्भिक मध्यकालीन उत्तर भारत में वर्ण से जाति का संक्रमण
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प्रारम्भिक मध्यकालीन उत्तर भारत का सामाजिक इतिहास वर्ण और जाति के पारस्परिक संबंधों में आए व्यापक परिवर्तनों को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्राचीन धर्मशास्त्रीय परम्परा में भारतीय समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - इन चार वर्णों के अंतर्गत व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया था, किंतु सामाजिक व्यवहार इस सैद्धान्तिक व्यवस्था की तुलना में कहीं अधिक जटिल था। लगभग 600 ई. से 1200 ई. के बीच उत्तर भारत में राजनीतिक सत्ता के क्षेत्रीयकरण, कृषि भूमि के विस्तार, ब्राह्मणों एवं धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान, नवीन ग्रामीण बस्तियों की स्थापना, जनजातीय समुदायों के कृषक समाज में समावेशन, व्यवसायों के विशेषीकरण तथा प्रशासनिक तंत्र के विस्तार ने अनेक नई सामाजिक पहचानों को जन्म दिया। ब्राह्मणों में क्षेत्र और मूल ग्राम के आधार पर उपविभाजन विकसित हुए, स्थानीय सैन्य एवं शासकीय समुदायों से राजपूत पहचान मजबूत हुई, लेखन और प्रशासन से जुड़े वर्गों से कायस्थ समुदाय का विकास हुआ तथा कृषक, व्यापारी, शिल्पी और सेवा-समूहों की अनेक जातियाँ सामाजिक संरचना का स्थायी भाग बनीं। अतः वर्ण से जाति का संक्रमण वर्ण-व्यवस्था के अंत का द्योतक नहीं था, बल्कि वर्ण के व्यापक वैचारिक ढाँचे के भीतर स्थानीय, वंशगत, व्यवसायगत और अंतर्विवाही जातीय इकाइयों के विस्तार की प्रक्रिया थी। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी सामाजिक परिवर्तन का ऐतिहासिक विश्लेषण करता है।
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