महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री की सामाजिक चेतना

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Dhodare Sarika Ramchandra, Dr. Rajendra Baviskar

Abstract

महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री की सामाजिक चेतना का स्वर गहन संवेदनशीलता, आत्मबोध और सामाजिक जागरण के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। उनके काव्य, निबंध और संस्मरणों में स्त्री को परंपरागत रूढ़ियों और पितृसत्तात्मक बंधनों से जूझती हुई एक जागरूक सामाजिक इकाई के रूप में चित्रित किया गया है, जो अपनी अस्मिता, गरिमा और अधिकारों के प्रति क्रमशः सचेत होती दिखाई देती है। महादेवी वर्मा ने स्त्री की पराधीनता के सामाजिक कारणों, शिक्षा की कमी, आर्थिक निर्भरता और सांस्कृतिक रूढ़ियों का यथार्थ विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि नारी की मुक्ति केवल बाह्य सुधारों से नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता और दृष्टिकोण में परिवर्तन से संभव है। उनके साहित्य में स्त्री की सामाजिक चेतना आत्मजागरण, स्वाभिमान, समानता और नैतिक स्वायत्तता के मूल्यों पर आधारित है, जो उसे समाज के मानवीय और प्रगतिशील पुनर्निर्माण की सक्रिय सहभागी बनाती है।

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How to Cite
Dhodare Sarika Ramchandra, Dr. Rajendra Baviskar. (2024). महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री की सामाजिक चेतना. International Journal of Advanced Research and Multidisciplinary Trends (IJARMT), 1(2), 698–707. Retrieved from https://ijarmt.com/index.php/j/article/view/730
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