पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सामाजिक–राजनीतिक विचार
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Abstract
भारतीय राजनीतिक चिंतन की परंपरा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सामाजिक–राजनीतिक विचार एक विशिष्ट और मौलिक योगदान के रूप में प्रतिष्ठित है। उनके चिंतन का केंद्रबिंदु भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और समग्र मानव विकास की अवधारणा रहा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने पश्चिमी पूँजीवाद और साम्यवाद–दोनों की एकांगी दृष्टियों की आलोचना करते हुए ‘एकात्म मानववाद’ का प्रतिपादन किया, जो व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के परस्पर समन्वय पर आधारित है। उनके अनुसार राजनीति का उद्देश्य सत्ता-प्राप्ति नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के माध्यम से राष्ट्र का नैतिक और सांस्कृतिक सशक्तिकरण होना चाहिए।यह शोध-पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सामाजिक–राजनीतिक विचारों का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें उनके सामाजिक दृष्टिकोण–जैसे सामाजिक समरसता, जातिगत विभाजन का उन्मूलन, सांस्कृतिक एकता और नैतिक अनुशासन–के साथ-साथ उनके राजनीतिक विचारों–जैसे लोकतंत्र की भारतीय व्याख्या, राष्ट्रवाद, स्वदेशी, विकेन्द्रीकरण और राज्य की नैतिक भूमिका–का सम्यक विवेचन किया गया है। शोध यह भी रेखांकित करता है कि उपाध्याय का चिंतन केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और नीति-निर्देशक था, जो भारतीय परिस्थितियों में विकास का स्वदेशी मॉडल प्रस्तुत करता है।समकालीन भारत में, जहाँ विकास, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न पुनः केंद्र में हैं, पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सामाजिक–राजनीतिक विचार विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। यह अध्ययन निष्कर्षतः स्थापित करता है कि उनका चिंतन भारतीय राजनीति को नैतिकता, समरसता और मानव-केंद्रित विकास की दिशा प्रदान करता है।
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